Monday, June 21, 2010

फिर गिरेगी कमजोर कंधो पर बोझ ढो रही भाजपा


भाजपा अपने घर में बैठे आस्तीन के साँपों के आलावा साथ देने का दम भर रहे भितरघातियों को ढो रही है। बिहार में सत्ता का सुख लेने के लिए भाजपा का दामन थामने वाले नीतिश कुमार जैसे नेता कमजोर कन्धों वाली भाजपा की ताक़त और औकात को बेहतर तरीके से समझते हैं। साढ़े चार साल सत्ता का आनंद लेने के बाद चुनाव नजदीक आता देख संत पुरुष बनने का दम भरने वाले नितिश ने वोट बैंक साधने के लिए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से पल्ला झाड़ने का ड्रामा किया। कभी मोदी के साथ रैली में गलबहियां करते हुए मुस्कराकर तस्वीर खिंचवाने वाले नीतिश को उसी तस्वीर के पोस्टर अख़बारों में छपने पर गुस्सा आ रहा है। उन्होंने इस नाटकीय गुस्से को जाहिर करने के लिए गुजरात से बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए मिला पांच करोड़ रूपए वापस कर दिया। ताकि कुछ लोगो में उनकी छवि बेहतर बन सके। सवाल ये है कि नितीश ने किस हैसियत से गुजरात का पैसा वापस करने का फैसला लिया। क्या बिहार सरकार का खजाना उनका पुश्तैनी है। वो भूल गए है कि लोकतंत्र में उनकी जिम्मेदारी केवल इस पैसे के बेहतर और इमानदार प्रबंधक की ही है। न कि खजाने के मालिक की। लेकिन इस पूरे प्रकरण में सत्ता के इस खेल के लिए सियासी नाटक रचने वाले नितिश नही बल्कि कमजोर साबित हो रहा भाजपा नेतृत्व जिम्मेदार है। फुंके हुए कारतूसो को राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारी सौंपकर आलाकमान पहले ही बता चुका है कि उसका काम करने का अंदाज क्या रहने वाला है। अब भला जो पार्टी खुद गर्त में जाने को तैयार हो उस कमजोर पार्टी के झुके हुए कन्धों को भला कौन सम्मान देगा। ऐसा तो कोई सियासी बेवकूफ ही कर सकता है और नितिश कम से कम ऐसे बेवकूफों की कतार में तो कतई शामिल नहीं होने वाले। मानों या न मानों, लेकिन ऐसा ही है ये देश मेरा...

Sunday, June 13, 2010

ये ही है दर्द और ख़ुशी की हकीकत


बीते सप्ताह की बात है। मेरे घर ७-८ साल से इलेक्ट्रिसिटी का काम करने वाला एक लड़का कई रोज से चक्कर लगा रहा था। कई बार मुझे उससे चिढ होने लगती है। इस बार उसना बताया कि उसकी मोटरसाइकिल दो दिन पहले पुलिस वालों ने पकड़ ली है। क्योंकि उसके कागज़ घर में सफेदी करते समय कहीं खो गए थे। पहले तो मैंने कहा कि कागज़ बिना मिले कुछ मदद नहीं हो सकती। लेकिन इतना सुनते ही उसका चेहरा उतार गया और वो चला गया। अगले रोज फिर मेरे घर में बिजली सही करने आया तो बिलकुल गुमशुम था। मुझे लगा इसकी मदद करनी चाहिए और मैंने ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट से डुप्लीकेट कागज़ निकलवाने का तरीका बताकर किसी बन्दे के पास भेज दिया। उसकी किस्मत से उसका काम भी हो गया। लड़का बहुत खुश था। कागज़ लेकर थाने गया तो यहाँ मिले साहब ने दो सौ रूपये की मांग कर डाली। परेशान लड़का उदास हो गया। दो दिन थाने के चक्कर लगता रहा और जब काम नहीं बना तो फिर डरता हुआ मेरे पास आया। मैंने वहां किसी शख्स से बात की। उसने लड़के की मोटर साइकिल छुडवा दी। वो बहुत खुश था। इतनी ख़ुशी शायद पहली बार मैंने उसके चेहरे पर देखि थी। और पहली बार लगा कि खुश तो कई बार मई भी होता हूँ, लेकिन उसके चेहरे पर जो ख़ुशी थी वो अहसास शायद ही कभी हुआ होगा। सोचने बैठा तो मन में आया ख़ुशी के भी कई रूप हैं। जब किसी कारण आत्मा पर चोट लगती है तो इलाज़ के बाद सुकून भी उतना ही होता है।

किसके लिए है सरकार और देश का कानून?


भोपाल में १९८४ के गैस हादसे में २५ हजार लोगो की जान चली गयी। जिस यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री में गैस रिसने से ये हादसा हुआ १९८२ में उसकी जांच के समय कई गड़बड़ियाँ सामने आई थी। लेकिन सरकार और कंपनी ने उन पर धयान नहीं दिया। क्योंकि सत्ता में बैठे लोग देश पर राज कर चुके गोरो के तलवे चाटने की मानसिकता से बहार नहीं निकल सके थे। हजारों लोगो की जान लेने के लिए जिम्मेदार कंपनी मालिक वारेन एंडरसेन भोपाल में पोलिसे के हत्थे चढ़ा तो तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने सरकारी पैसे से न केवल उसकी जमानत कराइ बल्कि सरकारी विमान से नई दिल्ली भी भिजवा दिया। आरोप लग रहे हैं कि अर्जुन सिंह के चुरहट ट्रस्ट को इस ईमानदारी भरे कारनामे को अंजाम देने की एवज में तीन करोड़ रूपए डोनेशन मिली थी। कहानी का असली पेंच अदालत में लगाया गया। अदालत ने गैर इरादतन हत्या के आरोप को लापरवाही से मौत की ऐसी धारा में बदल दिया, जिसका कोई खास मतलब ही नहीं है। जब १९८२ में फैक्ट्री की जांच के दौरान सुरक्षा समबन्धि कमियों का खुलासा हो चुका था तो उन पर ध्यान नहीं देने वाले लोगो को अदालत से ऐसी छुट मिलने का क्या मतलब है? अब केंद्र सरकार के कानून मंत्री न्यायपालिका को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं तो राज खुलने पर केंद्र और राज्य सरकार के तत्कालीन हुकुमरानो के असली चेहरों से पर्दा उठ रहा है। लेकिन हकीक़त ये भी है की अख़बारों और चैनलों की सुर्ख़ियों में शामिल भोपाल हादसा शायद अगले ही सप्ताह तक किसी दूसरी बड़ी खबर के आगे बहुत छोटा होकर रह जायेगा। २६ साल में न्याय के नाम पर हुआ मजाक कुछ दिनों के शौरगुल के बाद ख़ामोशी की चादर ओढ़ लेगा। मरने वालों की बेकदरी पहले ही हो चुकी है, दूसरी पीढी की जिन्दगी में गमों ने स्थाई जगह बना ली है। नेता कल भी मौज में थे और भविष्य में भी उनका कुछ बिगड़ने वाला नहीं है। जितना शोर मचाना है मचाओ। कोई नहीं सुनेगा। हर कोई जानता है कि इस देश में शोर कैसे दबाया जाता है। या खुद ही कैसे दब जाता है। क्योंकि ऐसा ही है ये देश मेरा।

Sunday, May 30, 2010

नक्सालियों से दहशतजदा सरकार


नक्सलवाद ने एक बार फिर बेक़सूर लोगो की जान ले ली। पश्चिम बंगाल में हुए ट्रेन हादसे में डेढ़ सौ लोगो को अपनी जान गवानी पड़ी। रेल मंत्री कहती हैं ये हादसा नक्सालियों की देन है और देश के गृहमंत्री कह रहे हैं ऐसे कोई तथ्य सामने नहीं आये हैं की हादसा नक्सालियों की देन है। लेकिन ट्रेन में मौजूद करमचारियों ने अपने बयां में हादसे के लिए बेरहम और आतंकवाद की राह पर चल रहे देशद्रोही नक्सालियों को आरोपी ठहराया है। कमजोरी और राजनीतिक कारणों से सरकार की चुप्पी से वाकिफ नक्सालियों ने दांतेवाडा के बाद कई नरसंहार करते हुए फिर से सरकार को उसकी और अपनी औकात बता दी है। धोखे से वार कर बेकसूरों की जान लेने वाले कायर और देशद्रोही नक्सालियों को ठिकाने लगाने के बजाये सरकार अभी तक कोई रणनीति ही तय नहीं कर पाई है। देश की राजधानी में नक्सल समर्थक जेएनयू जैसे विश्वविधालय में केंद्र सरकार की नाक के नीचे जवानों की मौत पर जश्न मानते हैं। पुलिस शिकायत मिलने पर भी रिपोर्ट दर्ज नहीं करती। भले ही ड्यूटी पर बरहमी से उनकी ही जैसे जवानों की कायरता से हत्या क्यों न कर दी गयी हो। देश की मजबूत बताने वाली सरकार देशद्रोहियों का समर्थन करने वाले गद्दारों के खिलाफ करवाई करने की हिम्मत नहीं जुटा पाती। पश्चिम बंगाल के हादसे के बाद ठोस करवाई करने के बजाये रेल मंत्रालय में नक्सल प्रभावित इलाकों में रात में रेलों कि आवाजाही नहीं करने का फैसला किया जा रहा है। ताकि जान माल के नुक्सान को रोका जा सके। जिन कायरों को जूतों तले कुचल देना चाहिए था उनकी दहशत में रात को ट्रेन नहीं चलने का फैसला सरकार की मजबूती (?) कर रहा है लेकिन फिर भी आवाम चुप है। क्योंकि यहाँ वो जिन्दा दिल लोग रहते हैं जो हादसों की परवाह नहीं करते। कितना भी बड़ा भूचाल आ जाये या लोगो की जान चली जाये, लोग अगले ही दिन फिर से अपने काम में जुट जाते हैं। लेकिन फिर भी सा गर्व से खड़े रहते हैं। क्योकि हम हर हाल में यही दोहराते नज़र आते है कि ये देश है मेरा

Friday, May 21, 2010

बेईमानों की दुनिया

जब कभी समाचार पत्र या टीवी पर धोकाधडी या अपनों के विश्वास का खून करने की घटनाओं के बारे में पढता या देखता था तो मन में ख्याल आता था कि कोई भी इंसान कैसे किसी का विश्वास तोड़ सकता है। लेकिन कहते हैं कि इस दुनिया में हर बात का जवाब यहीं मिल जाता है। ये सच भी है। कल तक पैसे का रोना रोकर मदद मांगने वाला इंसान थोड़ी ही कामयाबी मिलने के बाद कैसे आँखे बदलता है, एक घटना के बाद अब मुझे भी समझ आ गया। लेकिन अभी भी यकीं नहीं होता कि खुद को आपका हितेषी बताने वाला इंसान कैसे आपकी पीठ में छुरा घोपने से बाज नहीं आता। वो भी केवल इसलिए कि उसे पैसा ज्यादा प्यारा लगने लगता है, और इसलिए वो अपने वायदे और बातें भी भूल जाता है। खैर जवाब इसी जमीं पर मिलता है तो धोका करने वालों को परिणाम भी इसी जमीं पर मिल जाते हैं। बस फरक इतना है कि धोखा खाने वाला किसी पर यकीं नहीं कर पता और देने वाला अपनी मीठी बातों के साथ किसी और को ठगने कि योजना का ताना बना बुनता रहता है। बस ऐसा ही है देश मेरा......

Sunday, May 16, 2010

मंत्री जी को पड़ गए लेने के देने


दिल्ली सरकार में समाज कल्याण मंत्री की कुर्सी पर विराजमान माननीय मंगतराम सिंघल जी हाल ही में एक पंचसितारा होटल में गए थे। मुंबई के ताज होटल में आतंकी हमले के बाद तमाम होटलों की सिक्यूरिटी बढ़ी हुई है। मंत्री जी होटल में जाने लगे तो गेट पर ही उनकी कर की रोक लिया गया। कहा गया की सुरक्षा कारणों से कार की तलाशी लेना जरुरी है। अब मंत्रीदिल्ली में अलग ही हनक रखने के लिए जाने जाते हैं। भलाये ही कैसे बर्दाशत करते की मंत्री की कर की तलाशी ली जाये। क्योंकि उनकी नजर में मंत्री तो हर कानून से ऊपर होते हैं। उन्हें कहीं भी रोककर तलाशी लेने जैसा अपमानजनक काम किया जाये ये तो किसी भी सूरत में काबिले बर्दाशत नहीं हो सकता। बस फिर क्या था मंत्री जी का परा सातवें आसमान पर जा पहुंचा। समाज कल्याण के साथ मंत्री जी के पास लेबर डिपार्टमेंट भी है। उन्होंने अपने रुतबे और पॉवर का पर्योग किया और होटल में छपे मरने का फरमान जारी कर दिया। ये बात और है की दिल्ली में कहीं भी लेबर कानून का मजाक उड़ने पर डिपार्टमेंट के लोग कुछ नहीं करते हों या फिर बड़े लोगो की मलाई खाकर होठों पर जीब फेरते रहते हों, लेकिन मंत्री जी का फरमान किलते ही पूरा महकमा तमाम काम छोड़कर होटल में छपे मरने निकल पड़ा। कुछ ही देर में तमाम टीम होटल में थी और होटल के दस्तावेजों की जांच शुरू कर दी गयी। लेकिन मंत्री जी भूल गए कि जिस होटल को निशाना बनाया जा रहा है वो सड़क के किनारे चल रहा ढाबा नहीं पांचसितारा होटल है। यहाँ वो लोग भी फुर्सत के क्षणों में आते हैं, जिनके दरबार में मंत्री जैसे न जाने कितने नेता एक टांग पर खड़े रहते हैं। बस फिर क्या था होटल कि और से उन लीगों तक एक सन्देश पहुँचाया गया और मंत्री जी को लेने के देने पद गए। अब मंत्री जी चुप्पी साधे हुए हैं और सरकार होटल मनेजमेंट से माफ़ी मांग रही है। पता तो ये भी लगा है कि मंत्री जी बीते साल नवम्बर में भी एक पांच सितारा होटल में ऐसा ही कारनामा कर चुके हैं। तब ताज होटल में छापे डलवाए गए थे। लेकिन वो मामला जनता की नजर में नहीं आ सका तो मंत्री जी ने फिर वही कारनामा दोहराने की गलती कर डाली। खैर इस देश में शेर पर सवा शेर पड़ते देर नहीं लगती। क्योंकि कुछ ऐसा ही है देश मेरा.....

खाप पंचायतों में ख़ून से वोट बैंक भरने की राजनीति

आजकल देश में खाप पंचायतें चर्चा का केंद्र बनी हुई हैं। पुरानी परम्परा और संस्कृति के नाम पर शुरू ये पंचायतें जब कभी चर्चा में आती थी तो मुद्दे सामाजिक विकास और हक की लड़ाई से जुड़े होते थे। लेकिन समय के साथ हर चीज बदल रही है तो पंचायतों के विषय भी बदलने लगे हैं। पुरानी कहावत है की मियां बीवी राजी तो क्या करेगा काजी। लेकिन खाप पंचायतों के काजी कुछ भी करने को तैयार हैं। यहाँ तक की अपना फरमान नहीं मारने वालों की जान लेने तक से भी उन्हें परहेज नहीं है। हवाला दिया जाता है विरासत को सहेजकर रखने का और पुरानी परम्परा को बचने की लड़ाई का। खैर विषय बहुत गंभीर है। मुद्दे और फैंसले दोनों ग़लत हो सकते हैं। लेकिन पिछले कुछ दिनों में मीडिया में ख़बरें चली कि कांग्रेस संसद नवीन जिंदल ने खाप पंचायतों का समर्थन किया है। ये वो ही नवीन जिंदल हैं, जिन्हें राहुल गाँधी कि सोच कि उपज मन जाता है। सोच ये कि पढ़े लिखे नौजवान राजनीति में आयेंगे तो देश का विकास तो होगा ही पुरानी रवायतें भी बदलेंगी। शायद नवीन जिंदल का खाप पंच्यातों को दिया गया समर्थन तो राहुल गाँधी कि सोच पर खरा नहीं उतर रहा है। क्या ऐसा ही है देश मेरा.......

Tuesday, April 27, 2010

शोएब मालिक का सच

सुना है सानिया मिर्जा से निकाह करने के बाद पकिस्तान में दावत-अ- वलीमा में जुटने वाले अखबार नवीसों से कार्यक्रम की कवरेज के लिए पकिस्तान के क्रिकेट खिलाडी शोएब मालिक ने साढ़े तीन करोड़ रूपये की मांग की है। कमाल है अपनी खुबसूरत बीवी और एक मुल्क में शान बनी लड़की के साथ पाक बंधन में बंधने के बाद शोएब जैसा "इंसान" लोगो के प्यार और उत्सुकता की जानकारी बांटने के लिए भी पैसा मांग रहा है। शर्म आती है अपने आप को सेलेब्रिटी कहलाने का दावा करने वाले ऐसे बेशरम लोगो पर जो एक मुल्क में अपनी अलग शख्सियत होने के दम पर किसी दुसरे मुल्क की लड़की से शादी करके अपने मुल्क जाकर ऐसी घिनौनी मांग करते हैं। देखा तो नहीं है। लेकिन ऐसे ही वाकियों को सुनने का बाद लगता है की पकिस्तान के लोगो पर यकीं करना ठीक नहीं है। क्योंकि जो लोग अपनी हमसफ़र के बारे में सम्मान से जानने वाले लोंगो की भावनाओं के लिए भी पैसा मांग सकते हैं वो लोग कम से कम मेरे देश के गैरतमंद लोगो के पाँव की धूल भी नहीं हो सकते। क्योंकि मेरे देश में हमसफ़र को दिल से लगा कर रखा जाता है। उसका सम्मान करने वालों की सम्मान से एक झलक पाने की ख्वाहिश के लिए पैसा नहीं माँगा जाता है। फक्र है मुझे अपने देश और उसकी आवाम पर। क्योंकि ये देश है तो सिर्फ मेरा।

Monday, April 26, 2010

फिर बदली गडकरी की जुबान!

भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने एक अपने एक बयान में कहा है कि १९८४ में हुए सिख विरोधी दंगो के लिए कांग्रेस को जिमेद्दार ठहराना ठीक नहीं हैं। क्योंकि वो दंगे एक हत्याकांड के बाद हुए थे और वो लोगो की अपनी भावनाओ के कारण हुए थे। हो सकता है के कुछ लोग किसी पार्टी विशेष से जुड़े हुए हों। लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि कांग्रेस इसके लिए जिम्मेदार है। उन्होंने ये बात गुजरात के दंगो के लिए वहां के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को जिम्मेदार न मानने के सम्बन्ध में तर्क रखते हुए कही थी। सवाल ये नहीं है कि गुजरात दंगो के लिए मोदी जिम्मेदार हैं या नहीं। सवाल ये है के १९८४ के जिन दंगो की हकीक़त से पूरा देश वाकिफ है, उन दंगो के लिए गडकरी अपने बचाव में इतिहास को झुठलाने का प्रयास कर रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का ये बयान लाल कृष्ण अडवानी के उस बयान जैसा ही है जिसमे उन्होंने देश का विभाजन करने के लिए जिम्मेदार मोहम्मद अली जिन्ना की तारीफ की थी। लेकिन एक बहुत बड़ा फर्क है। वो ये कि अडवानी को लोग गंभीरता से लेते हैं और गडकरी को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद भी वो सम्मान नहीं मिल सका है। लेकिन गडकरी को ये ध्यान रखने की जरुरत है के देश में सब कुछ इतिहास और संस्कृति की बदौलत चल रहा है। हकीक़त को झुठलाने वाले बयान लोगो को हजम नहीं होते। और हाँ वो ये भी ध्यान रखें की जनता की नज़र में अडवाणी के एक ही बयान ने उनको राजनीतिक बुलंदियों को धरातल पर ला दिया था और गडकरी तो अभी तक बुलंदियां भी नहीं छू पायें हैं। अपना नहीं तो कम से कम भाजपा के रुतबे का तो ख्याल करें "गडकरी जी"। क्योंकि मेरे देश में जनता वोट भले ही किसी को भी दे देती हो लेकिन जख्मों को कुरेदने वाले लोग उसे पसंद नहीं हैं। क्योंकि कुछ ऐसा ही ही है "ये देश मेरा".

Sunday, April 25, 2010

आईपीएल का बुखार और बेखबर ''सरकार''

देश में नौजवानों से लेकर मीडिया तक पर आईपीएल का बुखार चढ़ा हुआ है। क्रिकेट के मैदान में आईपीएल का जुनून पैदा करने वाले ललित मोदी अब खुद इस मामले में खलनायक नज़र आ रहें हैं। ट्विट्टर पर लेख लिखकर देश कि जनता को जानवर कि संज्ञा देने जैसी घटनाओं से चर्चित केंद्रीय मंत्री शशि थरूर भी इसमें फंसे और खुद पर लगे आरोपों के "दाग" से नहीं बच पाए। बहरहाल आईपीएल की खुमारी और ज्यादा बढ़ गयी है। मंत्री जी तो सफाई देते-देते खुद साफ़ हो गए। लेकिन अब उन्ही की तरह मोदी जी कह रहें हैं कि सीट नहीं छोडूंगा। चाहे जो भी हो जाये। इतना ही नहीं धमकी भी दे रहें हैं कि "खेल" "खत्म" हुआ तो हमाम में नंगे रह चुके लोगो का पर्दाफाश कर दूंगा। आखिर वो जानते हैं कि मामले में फंसी हुई किस गर्दन का मौल क्या है। क्योंकि इस महान लोकतंत्र में "गर्दन" नहीं उसकी "मोटाई" देखकर फैसलें होते हैं। यहाँ "रसूख" बहुत मायने रखता है। तभी तो ख़बरें आ रही हैं कि कोई अपने खास खिलाडियों के लिए स्पेशल प्लेन लेकर उड़ गया, क्योंकि उनके पापा उड्डयन मंत्री थे। मैदान में सट्टेबाजी से बदनाम हुआ क्रिकेट इसी बदनामी के कारन अब सत्ता के गलियारों और धनाढ्य लोगो का शौक बन गया है। आप खुद देखिये क्रिकेट संघ के एक पदाधिकारी कोई और नहीं देश के कृषि मंत्री हैं। ये वो मंत्रालय है जिसका जिम्मा लोगो को सस्ता अनाज और खाने की चीजें मुहैयाँ करना हैं। लेकिन उनका मंत्रालय अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा पा रहा है। और जनता के रहमोकरम पर चुने गए नेताजी महंगाई कम करने नहीं बल्कि क्रिकेट के "खेल" को "सफाई" से करने पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं। अब तो इस करोडो के खेल में उनकी संसद बेटी के पति को भी फायदा मिलने जानकारियां सामने आ रही हैं। देश कि जनता भूखी रही है। लेकिन जिम्मेदार सरकार के होनहार नेता मैदान के खेल को सत्ता के गलियारों से ले जाकर करोड़पतियों की तिजोरी में पहुँचने में जुटे हुए हैं। लेकिन सरकार बेखबर है। हालाँकि हल्ला मच रहा है। लेकिन तब तक, जब तक कि मीडिया को इससे बड़ी कोई घटना या घोटाला नहीं मिल जाता। इतिहास गवाह हैं। हादसें ख़बरों का रुख मोड़ते रहे हैं और घोटालों के दौरान बेशर्मी से मुस्कराकर "कानून" में "विश्वास" जताने वाले लोग आज भी इस "महान लोकतंत्र" में "आज़ादी" से "सुरक्षा" के साथ घूम रहे हैं। ''खेल'' था ''हो'' गया। लोगो को समझना होगा। क्योंकि ऐसा ही है ''ये देश मेरा''

Saturday, January 30, 2010

क्या है किसी जिन्दी का मौल?

आज मै एक घटना को लेकर किसी से चर्चा कर रहा था कि अदालत ने महज १०० रुपए के लिए क़ी गयी एक जवान युवक कि हत्या करने के तरीके को दुर्लभ घटना मानने से इनकार करते हुए, हत्यारों को मौत कि सजा देने इनकार कर दिया। कानूनी तकाजे को जानने के बाद कहा जा सकता है कि हत्या की ये वारदात दुर्लभ घटनाओं कि श्रेणी में नहीं आती। लेकिन एक प्रश्न भी मन में आ रहा है कि क्या जीवन का कोई मौल हो सकता है? पिछले दिनों मेरे एक परिचित युवक की मौत हो गयी। युवक घर में अकेला रहता था। दो दिन बाद किसी ने घर नहीं खुलने पर ध्यान दिया और पुलिस को बुलाया तो मौत कि जानकारी मिली। सभी परिचितों ने अफ़सोस जताया और दो दिन बाद किसी ने इस मौत का जिक्र भी नहीं किया। लेकिन दो महीने बाद एक परिचित युवक की सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गयी। उसकी कुछ माह पहले ही शादी हुई थी। एक महीने तक जानकार घटना का जिक्र करके अफ़सोस जताते रहे। अब तो उसके घर में भी घटना को लोग भूलने लगे हैं। लेकिन तीन माह पहले एक और युवक दुर्घटना के कारण मौत का शिकार बन गया था। उसके घर में बूढ़े माँ-बाप हैं। मरने वाला युवक दोनों के बुढ़ापे का सहारा था। युवक तो जीवन की दौड़ में मौत से हार गया, लेकिन उसके माँ-बाप आज भी हर रोज हर क्षण उसे याद करके आंसू बहाते हैं। क्योंकि अब उनका जीवन बहुत संघर्ष में बीत रहा है। तीनो घटनाओं का आंकलन करके मन में ख्याल आता है कि मौत तो तीनो ही घटनाओं में हुई है। फिर किसके जीवन का क्या मौल है? क्या सांसारिक जरूरतें ही किसी इंसान के जीवन का मौल तय करती हैं? मैंने तो सुना था कि जीवन का कोई मौल नहीं है।

Saturday, September 26, 2009

विचारों की उथल-पुथल और जिन्दगी की मंजिल

अभी थोड़ा समय मिला तो मन में विचार आया की इंसान खाली समय में क्या सोचता रहता है? मैं तो जब भी वक्त मिलता है, अतीत में चला जाता हूँ। हालाँकि कहते हैं अतीत में झाँकने से कुछ नही मिलता। लेकिन ये भी सुना है कि पुराने दौर को याद रखना चाहिए। क्योंकि वो आपके जीवन को दिशा देने में मदद करता है। बताता है कि जिन्दगी की हकीक़त क्या थी? खैर कई बार विचारों के रथ पर सवार हुआ तो पता नही किस दिशा में पहुँच जाता हूँ। या यूँ कहूँ ख्याल क्या होता है और मन में क्या आ जाता है। सोच रहा था कॉलेज के दिनों के बारे में और उन हरकतों के बारे में जिनका ख्याल आते ही चेहरे पर मुस्कराहट आ जाती है और अचानक उस दौर के बारे में जब जीवन कि दिशा यानि राह तय करने का समय आया तो अजीब सी कशमकश चलने लगी थी। लेकिन अचानक से जिन्दगी को ख़ुद बा ख़ुद दिशा मिल गई। फ़िर एक मुश्किल भरा दौर आया। रास्ता ही धुंधला सा नजर आने लगा था। लेकिन अपनों ने तब भी संभाल लिया। मगर जीवन है और सब कुछ तो कभी भी बेहतर नही हो पाता। जीवन में एक मोड़ आया और इस बार फैंसला करना कठिन लगने लगा। क्योंकि दिल और दिमाग ही नही दिल भी दो दिशाओं में चल रहा था। दिल और दिमाग कभी कभी एक साथ नही चलते ये तो सुना था। लेकिन यहाँ तो मामला दिल की दो दिशाओं का था। दिल ही दो अलग दिशाओं की और चलना चाह रहा था और ऐसा तो सम्भव नही था। लेकिन इस बार भी फैंसला कर लिया। कठिन था, मगर इरादा बना लिया कि फैंसले पर अटल रहना है। कई साल यही कशमकश चलती रही और इस बार भी किस्मत ने फ़िर से मेरा ही साथ दिया। लग रहा है सब ठीक है। जीवन की एक और जंग में राह तय हो गई है। लेकिन अभी भी ख्याल आता है की क्या मैं उन उम्मीदों पर खरा उतार पाउँगा जो मुझसे हैं? क्या इस बार भी जीवन के संघर्ष में किस्मत मेरा ही साथ देगी। हमेशा की तरह? लेकिन इरादा पक्का है, मंजिल तय की है तो उसी की राह पर चलना भी है। क्योंकि इस बार तो किस्मत ही मेरी हमसफ़र है।

सावधान सरकार खेल (राष्ट्रमंडल) में व्यस्त है.

देश की राजधाने में जनता पीने के पानी के लिए तरस रही है। लोगो को इस मौसम में भी बिजली की किल्लत झेलनी पड़ रही है। सड़को की हालत ऐसी है कि प्रेगनेन्ट महिला को इनसे होकर अस्पताल ले जाने निकलें तो डिलीवरी का खर्चा बच जाए। शहर में यातायात जाम स्थायी समस्या बन गया है। पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम पूरी तरह लचर हो चुका है। बदमाश बेखौफ होकर अपने काम को अंजाम दे रहे हैं।
सरकार कहती है कि दिल्ली में हरयाली बढ़ रही है, लेकिन गर्मी और बढ़ते हुए तापमान से जूझ रहे इंसान को सड़क किनारे सस्ताने के लिए भी छाँव तक नही मिल पाती। अब जनता है कि हर बात के लिए सरकार और अफसरों को जिमेद्दार ठहरा रही है। कहती है समस्या दूर करने में सरकार ध्यान नही दे रही। अब जनता तो जनता है। कुछ भी कह देती है। नही जानती कि सरकार को बहुत काम हैं। बेचारी सरकार के मंत्री और अफसर अपने एसी कमरों में होने वाली मीटिंगों में ही इतने व्यस्त रहते हैं कि बाहर की हकीक़त देख ही नही पाते। अब भला जनता क्या जाने राजकाज की बातें?
जानती नही है कि सरकार कितनी मेहनत करती है? अगले साल दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेल होने वालें हैं। विदेशों से बड़ी संख्या में लोग इसमे हिस्सा लेंगे। इसके लिए तैयारियां करनी हैं। जनता तो सरकार की अपनी है। बिना बिजली और पानी के भी रह सकती है। यातायात जाम और गड्ढों वाली सड़को से गुजरने की आदि हो चुकी है। लेकिन बाहर से आने वालों का ख्याल रखना ज्यादा जरुरी है। जनता को ये बात समझनी चाहिए।
इसलिए इस देश, शहर और सरकार की अपनी बेचारी जनता को चेतावनी दी जाती है कि बिजली, पानी, सड़क, यातायात जाम, अपराध, पब्लिक ट्रांसपोर्ट सिस्टम या किसी और समस्या को उठाने की हिमाकत न करे। क्योंकि इससे सरकार का ध्यान भंग हो सकता है और सरकार अपने सबसे महत्वपूर्ण काम यानि खेल करने....ओह....माफ़ करें खेलों कि तैयारी में व्यस्त है।

Thursday, September 24, 2009

किसके लिया और किसके साथ

दिल्ली के अख़बारों में खबरें छप रही हैं कि सीपी साहब के खास डीसीपी साहब ने अपनी व्यक्तिगत दुश्मनी निकलने के लिए सफदरजंग अस्पताल के एम्एस के ख़िलाफ़ झूठा मुकदमा दर्ज करा दिया। एमएस साहब का कसूर ये था कि उन्होंने डीसीपी साहब के रिश्तेदारको मेडिकल कोर्स में दाखिला नही दिया था। अब शहर में रहना है और डीसीपी साहब के रिश्तेदार को तवज्जो नही मिले, ये तो पुलिस की साख पर बट्टा लगाने वाला काम है न? एमएस साहब ने पुलिस की साख पर बट्टा लगाया था, तो परिणाम भी भुगतना ही पड़ेगा न। कहा तो यह भी जा रहा है कि डीसीपी साहब ने हाल ही में अस्पताल से एचआईवी संक्रमण वाले खून के मामले का खुलासा भी किया था। ये बात और है कि अस्पताल के रिकॉर्ड में वो खून नष्ट किया जा चुका है। लेकिन डीसीपी साहब ने मीडिया में ये भी कह दिया कि पुलिस जांच कर रही है कि ये खून कहीं लोगो को तो नही चढाया गया है? साहब ने तो केवल आशंका ही व्यक्त की और अस्पताल में खून चढवा चुके लोगो के दिलों की धड़कने तेज हो गई हैं। बेचारों को क्या पता था कि अस्पताल में खून चढ़वाने के बाद डीसीपी और डॉक्टर साहब की लडाई में ईलाज के बाद ये दिन भी देखना पड़ेगा। धन्य है दिल्ली की महान पुलिस और उसके डीसीपी साहब। बदमाश खौफ नही खाते तो क्या हुआ? कम से कम आम लोगों को तो पुलिस से डरना ही चाहिए।

Wednesday, September 23, 2009

खजूरी हादसा और सरकार. ये दिल्ली है मेरे यार

देश की राजधानी दिल्ली के स्कूल में हादसा हो गयापांच नन्ही बच्चियों की जान चली गईस्कूल की बच्चियों का आरोप थाकि हादसे का कारण लड़कियों के साथ कि गई छेड़छाड़ थीमुख्यमंत्री से लेकर अन्य नेता तक हाल जानने पहुंचेमृत बच्चियोंके घरवालों को मुआवजे का एलान कर दिया गयासरकार ने जांच कमेटी बैठा दीलेकिन रिपोर्ट आने सा पहले ही डीसीपीएस एस यादव ने कह दिया कि हादसा छेड़छाड़ के कारण नही हुआ थाअब दिल्ली सरकार के राजस्व उपायुक्त टी सी नख नेभी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि हादसा छेड़छाड़ के कारण नही हुआ हैहादसे का कारण स्कूल में छोटी सी जगह पर ज्यादातादाद में बच्चों को ठूंसने के कारण हुआ थाऐसा लगता है रिपोर्ट के नाम पर मृत बच्चों के साथ मजाक किया गया हैशायदउपायुक्त श्री नख साहब दिल्ली के सरकारी स्कूलों की हालत से वाकिफ नही हैंआखिर होंगे भी कैसे एसी कमरे और गाड़ी सेनिकलने का मौका जो नही मिलता बेचारों कोदिल्ली के स्कूलों की हकीक़त देख लें तो शायद मालूम हो जाएगा कि बाछेंकिन मुश्किल हालात में पढ़ रहे हैंआज भी ज्यादातर स्कूलों में क्षमता से ज्यादा बच्चों को ठूंसकर रखा जाता हैस्कूलों किइमारतें खतरनाक हालत में हैंस्कूलों में पीने का पानी नही हैटॉयलेट कि सुविधा नही हैस्कूलों के बहार छुट्टी के समय आवारा लड़कों का हुजूम लगा रहता है और पुलिस तथा प्रशासन इन पर अंकुश लगाने में नाकाम साबित हो रहा है। लेकिन सरकार और पुलिस को इससे कोई सरोकार नही है। भले ही पांच कि जगह पचास मासूम लड़कियां क्यों न अपनी जान दे देन। कम से कम १.७ करोड़ कि आबादी में तो इतनी जानें सरकार के लिए कोई मतलब नही रखती।

कौन कहता है सड़क पर भीख मांगते हैं भिखारी

लोग कहते हैं राजधानी की सड़कों पर भीख मांगने वाले लोग शहरी की छवि पर बट्टा लगा रहे हैं! लेकिन हम पूछते हैं जब सरकार और पुलिस को भिखारी नजर नहीं आ रहे, तो आपको भला भिखारी कहां से नजर आ गए! अरे जनाब! आप जानते भी हैं कि भिखारी किसे कहते हैं? चलिए हम आपको बता देते हैं! भिखारी वास्तव में वह लोग होते हैं जो आर्थिक विवशता व अन्य परेशानी के कारण लोगों के सामने याचक बनकर खाने व अन्य मदद की गुहार लगाते हैं। और अपनी दिल्ली में तो ऐसे लोगों की तलाश करने पर कुछ नहीं मिलने वाला।
हैरान होने की आवश्यकता नहीं है। यहां आपको भिखारी नहीं, बल्कि ऐसे लोग ही नजर आएंगे जो लाल बत्ती पर रूकी हुई आपकी कार के शीशे पर हाथ मारकर पैसे मांगते हैं। आप भले ही उन्हें इंकार कर दें या कार से दूर होने के लिए कहें। मगर क्या मजाल की वह अपने अधिकार के लिए ना लड़े! जब तक बत्ती लाल रहेगी, कार के शीशे को थपथपाते उनके हाथ और कार से चेहरा सटाकर भीतर झांकती उनकी निगाहें हट नहीं सकती। आपको बुरा लगता है तो लगता रहे! उन्हें इससे कोई सरोकार नहीं है। वह तो अपने कार्यक्षेत्र में अपना काम कर रहे हैं। अब आपको नहीं पसंद आया तो न सही। लेकिन उन्हें भिखारी कहने का अधिकार आपको नहीं है!
सड़क और चौराहों पर भीख मांगने वाले लोग कोई मामूली आदमी नहीं है। वह इस काम के लिए बाकायदा पुलिस और समाज कल्याण विभाग को अपनी कमाई में हिस्सा देते हैं। वह ऐसे प्रोफेसनल व्यापारी लोग हैं जो बाकायदा एक क्षेत्र विशेष में अपने काम को अंजाम देते हैं। जहां पर महिला भिखारी बीमार नजर आने वाले बच्चे को किराए पर लाकर उसके नाम पर आपसे मदद मांगती हैं। जहां फटेहाल और बीमार नजर आ रहे मासूम बच्चों की कमाई में से भी बाकायदा कुछ लोगों को हिस्सा जाता है।
ऐसे में यदि कोई संस्था यह कहे कि भीख मांगना अपराध नहीं होना चाहिए तो भला क्या गलत कह रही है? लोग बेचारे अपनी नशे की आदत से मजबूर होकर आपसे पैसा मांगते हैं। हट्टे-कट्टे हैं, मगर मेहनत करने के बजाए भीख मांगकर पेट भरने में विश्वास रखते हैं। पुरूष, कलाकारों की तरह महिला की वेशभूषा में कला दिखाकर पैसे मांगते हैं और नहीं देने पर अधिकार के साथ आपको अपशब्दों से भी नवाजते हैं। फिर ऐसे लोग भला भिखारी कैसे हो सकते हैं। वह तो यह काम उतने ही अधिकार से करते हैं, जितने अधिकार के साथ आप अपना काम करते हैं। भीख मांगना तो उनका मौलिक अधिकार है।

Monday, September 21, 2009

सच का सामना आएं नेताजी तो क्या हो

चर्चित और विवादित टीवी कार्यक्रम सच का सामना में इस बार एक नेताजी मंच पर बैठे हुए थे। एंकर ने पहला सवाल दागा कि क्या आपको टिकट ईमानदारी और मेहनत के कारण मिला था। पहले ही सवाल को सुन ठंडी हवा फेंक रहे एसी के सामने बैठे नेताजी के माथे पर पसीना नजर आने लगा। नेताजी शायद यह सोच रहे थे कि जवाब देते ही उनका तिया-पांचा होना तय हैं। सच बोला तो जनता जूते मारेगी और जवाब हां में दिया तो पहली ही बॉल पर बोल्ड होना तय हैं।

दर्शकों में नेताजी के कुछ राजदार भी बैठ हुए थे। उनमें नेताजी के ऐसे चव्वे भी थे जिन्हें नेताजी विपरित परिस्थितियों से निपटने के लिए खास मित्र बताकर साथ लाए थे। उनमें से एक चव्वा सामने लगा बजर बजाना ही चाहता था कि नेताजी ने इशारे से इंकार कर दिया। चव्वा परेशान यह नेताजी को क्या हो गया है? खुद ही अपनी फजीहत क्यों कराना चाह रहे हैं? मगर वह नेताजी की राजनीति और हार्ट-अटैक से बहुत ज्यादा वाकिफ नहीं था। वह सोच ही रहा था कि नेताजी ने अचानक से सीने पर हाथ रखा और नेताजी को हाट-अटैक हो गया। बेचारा एंकर भी परेशान। सोचने लगा कि नेताजी के हार्ट-अटैक का कारण उसे मान लिया गया तो घर और स्टूडियो पर पथराव और धरने-प्रदर्शन का दौर शुरू हो जाए।

अभी वह सोच ही रहा था कि डायरेक्टर ने मोबाइल पर फोन कर दिया। बोला कहीं नेताजी भगवान को प्यारे हो गए और मौत के कारणों की जांच के लिए गठित कमेटी के सामने पॉलीग्राफ मशीन ने हार्ट-अटैक का सही कारण बता दिया तो, तुम्हारा तो जो होना है होगा, मैं तो मुफ्त में ही मारा जाऊंगा। नेताजी भी इस पूरे प्रकरण में एक आंख खोलकर नजारा देख और सुन-समझ रहे थे। अब चूंकि पसीना एंकर के माथे पर रहा था तो बेचारे नेताजी को तरस गया और तेज चिल्लाते हुए बोले मुझे रेस्ट रूम में ले चलो।

पहले से ही अपनी हालत पर घबराया एंकर उन्हें कमरे में ले गया और जैसे ही नेताजी को बिस्तर पर लिटाया, उन्हांेने कहा बाकी लोगों को बाहर भेज दो और केवल तुम रूक जाओ। एंकर परेशान कि उसके साथ यह क्या होने जा रहा है। मगर पहले ही घबराया था तो नेताजी की बात मानने के अलावा कोई चारा नजर नहीं आया। जैसे ही उसने सभी लोगों को बाहर निकालकर दरवाजा बंद किया, नेताजी मुस्कराते हुए उठकर चहलकदमी करने लगे। बोले बेटा तुम्हारी उम्र कितनी है? हमें ही फंसाना चाह रहा था? हम इतने घोटाले करते हैं और लाखों लोगों को चुनाव के कुछ ही दिनों में बेवकूफ बनाने का हुनर जानते हैं और तुम हमारे ही उस्ताद बनने के चक्कर में थे। अभी वह कुछ बोल ही पाता कि नेताजी फिर से बोलने लगे, कि हार्ट-अटैक आम इंसान के लिए ही परेशानी का कारण होता है। हमें तो यह जब भी आता है, मदद ही करता है। और हां यह भी बता दे रहे हैं कि हममें हार्ट ही नहीं है तो अटैक कैसे पड़ेगा। एंकर को सब समझ में गया और उसने कान पकड़कर तौबा कर ली कि भविष्य में किसी कार्यक्रम में किसी नेता को नहीं बुलाएगा। दरअसल नेताजी की जगह एंकर खुद ही 'सच का सामना" कर चुका था।

Monday, February 16, 2009

आत्महत्या समाधान या शुरुआत......

आत्महत्या.... सुनने में कुछ अहसास भले ही न हो, लेकिन जब ख़ुद या किसी अपने के परिवार का मामला हो तो अहसास का अंदाज ख़ुद बा ख़ुद हो जाता है। लेकिन ये तो उनके लिए है जिनके अपनों ने ये कदम उठाया हो। मैं बात करना चाहता हूँ उनकी जो केवन न्यूज़ या कहीं और से ऐसी जानकारी लेते हैं। चाहता तो नही पर विवश हूँ सोचने के लिए उन बुजदिलों के बारे में जो ये कदम उठाते हैं। बात अगर तह में जाकर करें तो समझने में आसानी होगी।
मां बाप यानि इस धरती पर ऐसे लोग जो चाहते हैं उनका बच्चा इस जीवन में वहां तक जाए जहाँ वो नही जा पायें हैं। उनकी अपनी पहचान अपने बच्चे के नाम से हो। विषय का एक पहलु ये भी हैं कि वो किस तरह अपनी औलाद को पालते हैं। ख़ुद भूखे रहकर बच्चों के लिए बेहतर खाना लातेहैं। ख़ुद कपड़े नही सिलाते पर बच्चों के लिए महंगे कपड़े लाते हैं। कर्जा लेकर उसे पढाते हैं। क्या इसलिए कि औलाद बुढापे का सहारा बनने के बजाए एक दिन फंदा लगाकर फंसी पर झूलती मिले ? क्या बच्चो की कोई ड्यूटी नहीं हैं ? क्या उनका फर्ज नही है कि वो माँ बाप की तरह हर मुसीबत से लड़ें ? बुजुर्ग हो रहे माँ बाप कि सेवा के लिए अपना जीवन लगा दें ? जैसे उन्होंने बचपन में हर संघर्ष में बच्चो के लिए त्याग किया, उस तरह मुसीबत उठाकर माँ बाप के लिए खुश रहकर सेवा भावः से काम करें ?
लेकिन नही। माँ बाप की मेहनत और त्याग से दिए गए सबक को सीखना तो अपमान है। एक समस्या आई नही कि आत्महत्या का फैंसला कर लिया। एक नोट भी लिख दिया कि मैं अपने घरवालों से बहुत प्यार करता हूँ। सभी ने मेरे लिए बहुत कुछ किया हैं। मैं उन्हें खुशी नही दे पाया। मुझे अफ़सोस रहेगा। मेरी इच्छा है मेरे शरीर के अंगो को दान कर दिया जाए।
क्या केवल इतना लिखने से समाधान हो जाता है ? क्या कभी ये सोचा है कि बूढे हो रहे माँ बाप का सहारा कौन बनेगा ? जब उन्हें जवान बच्चे कीजरुरत है तो कौन जिम्मेदारी संभालेगा ? बूढे हो रहे बाप को कौन सहारा देगा ? कौन बूढी मां के आँचल में सिर रखकर उसे प्यार का वो अहसास दिलाएगा जो उसके मन कि गहराइयों को छू जाए ?
इस देश के नौजवानों को सोचना होगा कि उनकी जिम्मेदारी क्या है ? आत्महत्या समस्या का अंत है या बुजदिल इंसान के कदम के बाद एक परिवार के सामने आने वाले संकटों की शुरुआत ? इस देश में शायद पहले ऐसा नही होता था? यदि ये आधुनिकता कि देन है तो शायद कोई माँ बाप नही चाहेगा कि उसकी औलाद इतना पढ़े कि ऐसे फैसले लेने लायक हो जाए...

Wednesday, February 11, 2009

भला कैसे अलग है भाजपा औरों से....

प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं और अनुशासन का दावा करने वाली भारतीय जनता पार्टी के नेता अभी तक दिल्ली विधानसभा चुनाव की हार से उबर नही पा रहे हैं। कभी किसी नेता को दोषी बताया जाता है तो कभी कहा जाता है कि युवाओं ने पार्टी का साथ नही दिया। ऐसा तब हो रहा है जब पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण अडवाणी कह चुके हैं कि चुनाव में टिकट वितरण की खामी रही और इसीलिए पार्टी को पराजय का मुंह देखना पड़ा। एक महीने पहले पार्टी नेतृत्व बदला तो गहन मंथन के स्थान पर हार का नया ही कारण बता दिया गया। प्रदेश अध्यक्ष ओमप्रकाश कोहली कह रहे हैं कि दिल्ली में दस लाख फर्जी वोटर हैं और उन्होंने पार्टी को हरवा दिया। शहर में कुल वोटरों कि संख्या एक करोड़ छ लाख है। हकीकत में दस लाख फर्जी वोटर हैं तो दिल्ली में हर दसवां आदमी फर्जी है।
पार्टी को चाहिए था कि मंथन करती और हार के सही कारणों को स्वीकार किया जाता। क्योंकि हार को स्वीकार करने में भी बड़प्पन ही नजर आता। कहते हैं जख्म कुरेदने से नासूर बन जाता है। मगर गुटबाजी में जुटे पार्टी नेता इस और ध्यान नही दे रहे। समस्या को नासूर बनाने में जुटे हैं। नही विचार कर रहे कि जमीन से ताल्लुक रखने वाले कार्यकर्ता अब पहले जैसे क्यों नही रहें?
रहे भी क्यों? सत्ता मिलते ही उसकी अपनी पार्टी के नेताओं का मिजाज जो बदल जाता है। काम होते नही और सम्मान भी नही मिलता। जब अफसरों से ही काम करना है तो दूसरी पार्टी के सत्ता में होने पर भी कराया जा सकता है। फ़िर मेहनत करने कि क्या जरुरत है?
अब सवाल ये है कि पार्टी क्यों बूथ लेवल कार्यकर्ता को सम्मान नही देती? क्यों सही लोगो को टिकट नही दिया जाता? क्यों हारने वालों पर दांव लगाया जाता है? क्यों बड़े नेता अपने खास और सेवा करने वालों कमजोर लोगों को टिकट देने के लिए पैरवी करते हैं? जब ऐसा होता रहेगा तो क्या फर्क रह जाता है पार्टी में, जो उसे औरों से अलग कर दे।